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पिछड़ों के पिछड़े

Publish Date: August 25 2018 04:16:36pm

अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) आयोग को हाल ही में मोदी सरकार ने संवैधानिक दर्जा दिया है। सरकार का लक्ष्य है कि पिछड़े वर्ग में भी पिछड़ती जातियों का विकास करना। सरकार इस मामले में आयोग की रिपोर्ट का इंतजार कर रही है पर सरकार को मिली सूचना अनुसार आरक्षण का लाभ मात्र चार मुख्य पिछड़ी जातियों को ही मिला, शेष आरक्षण के लाभ से वंचित ही हैं।

केंद्र सरकार को मिली जानकारी अनुसार ओबीसी को मिले 27 फीसद आरक्षण में से 20 फीसद से अधिक यानी कुल कोटे का लगभग 75 फीसदी लाभ सिर्फ तीन-चार ओबीसी जातियों तक ही सीमित रहा है। इनमें यादव, कुर्मी, साहू और नाई शामिल हैं। इस तरह अन्य ओबोसी जातियों-उपजातियों को कोटे के शेष सात फीसदी में ही प्रतिनिधित्व मिल रहा है। लिहाजा, सरकार अन्य पिछड़ा वर्ग का लाभ के आधार पर वर्गीकरण करने पर विचार कर रही है। ओबीसी आरक्षण को लेकर यह स्थिति तब है, जब केंद्रीय सूची में मौजूदा समय में 2479 ओबीसी जातियां शामिल हैं। ऐसे में आरक्षण के लाभ से ओबीसी के एक बड़े वर्ग का वंचित रहना चौंकाने वाला है। हालांकि आयोग से जुड़े सूत्रों के मुताबिक अभी इसका निचले स्तर तक अध्ययन कराया जा रहा है। आयोग ने इस दौरान जो आधार बनाया है, उनमें ओबीसी जातियों के शैक्षणिक, सरकारी नौकरी और पंचायत स्तर पर मिलने वाले प्रतिनिधित्व को शामिल किया है। इसके अलावा छात्रवृत्ति आदि में भी इनके मिलने वाले लाभों को वर्गीकृत किया है। सरकार की कोशिश है कि आरक्षण के बावजूद इसके लाभ से वंचित रह गई जातियों को ज्यादा लाभ देकर उन्हें आगे बढ़ाया जाए। इसके तहत ओबीसी आरक्षण का वर्गीकरण करने की तैयारी है। सरकार के लिए वैसे भी वह आसान होगा, क्योंकि कई राज्य पहले से ही ओबीसी आरक्षण का वर्गीकरण कर चुके हैं। माना जा रहा है कि सरकार को इसका लाभ चुनाव के दौरान मिल सकता है, क्योंकि आरक्षण के बाद भी लाभ से वंचित ओबीसी का एक बड़ा समूह इस बदलाव के बाद फायदे में आ जाएगा। सरकार ने जस्टिस जी. रोहणी के नेतृत्व में एक आयोग का गठन किया है, जिसका कार्यकाल नवम्बर तक कर दिया गया है।

देश के सर्वोच्च न्यायालय में उच्च पदों पर बैठे एससी-एसटी समुदाय के समृद्ध लोगों के परिजनों को नौकरियों में 'प्रमोशन कोटा' को लेकर सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय की पांच जजों की संविधान पीठ ने पूछा आरक्षण की बदौलत मि. एक्स किसी राज्य के मुख्य सचिव बन गए। अब क्या उनके परिजनों को इतना पिछड़ा मानना उचित होगा कि उन्हें प्रमोशन में कोटा दें, ताकि उन्हें त्वरित वरिष्ठता मिल जाए। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि एससी-एसटी के समृद्ध लोगों को प्रमोशन में कोटा से इनकार करने के लिए क्रीमी लेयर सिद्धांत लागू क्यों नहीं हो सकता। अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल की टीम ने प्रमोशन में कोटा का समर्थन किया। इन्होंने मांग की कि साल 2006 का एम नागराज फैसला पुनर्विचार के लिए बड़ी बेंच को भेजा जाए। यह फैसला कहता है कि एससी-एसटी कर्मियों को प्रमोशन में कोटा देने से पहले पिछड़ेपन, नौकरियों में कम प्रतिनिधित्व और पूरी प्रशासनिक दक्षता का मात्रात्मक डेटा देने के लिए राज्य बाध्य हैं। दलील है कि इस फैसले के चलते प्रमोशन में एससी-एसटी का आरक्षण बंद हो गया है। दूसरी तरफ, सीनियर एडवोकेट शांति भूषण और राजीव धवन ने प्रमोशन में कोटा का विरोध किया।

उपरोक्त तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हरकिशन संतोषी की पुस्तक 'दलितों के दलितÓ की याद आई है। वाल्मीकि समुदाय को लेकर संतोषी द्वारा लिखी उपरोक्त पुस्तक में वह प्रश्न उठाते हैं कि कौन है दलित? 'आज वर्तमान भी पूछा रहा है कि आखिर दलित कौन है? क्या वह दलित है? जो अनुसूचित जाति एवं जनजाति से संबंधित है। चाहे वह मंत्री, व्यापारी, राजनैतिक, शिक्षाविद और न्यायविद ही क्यों न हो? या वह दलित है जो सांस्कृतिक, सामाजिक, राजनैतिक एवं आर्थिक रूप से पिछड़ा हुआ है, चाहे वह किसी भी जाति या समुदाय से क्यों न हो? या फिर दलित वह है जिसे मनु की व्यवस्था-वर्णव्यवस्था ने एक विशेष वर्ग में जन्म लेने के कारण समाज से हजारों वर्ष पीछे धकेल दिया है और अस्पृश्यता के शिकंजों में जकड़कर छोड़ दिया है। उन्हें सताया, अपमानित किया। जानवरों के योग्य भी जीवन न जीने दिया या फिर वह दलित है जो सवर्ण जाति का है किन्तु आर्थिक एवं सामाजिक रूप से पिछड़ा हुआ है, फिर भी, वह सवर्ण जाति में जन्म लेने के कारण मान-सम्मान पाने योग्य है और उसी कारण वह समाज में प्रतिष्ठा पाता है। या दलित वह है जो दो टूक रोटी के लिए मनुष्य होते हुए भी मनुष्य का मलमूत्र अपने सिर पर ढोता है, वह स्वयं ही नहीं उसके बच्चे भी इस कार्य में जुट जाते हैं। विवाह आदि के अवसर या दूसरों की जूठन खाता है। बचा हुआ खाना जो बस्ती के कुत्तों के हिस्से में आना चाहिए उसे वह स्वयं खाता है। शिक्षा की किरण उसके घर से झांककर चली जाती है। जिसके घर में धर्म, देशी घी बनकर गायब हो जाता है, मान-स्वाभिमान जिसके लिए शून्य के बराबर हो गया है और जिसका मानसिक स्तर, पतन के स्तर पर और सामाजिक स्तर, बदतर-ही-बदतर हो गया है, साथ ही जिसकी आर्थिक स्थिति हिन्दू धर्म की झूठी मान्यता प्राप्त करने हेतु रीति-रिवाजों के अनुपालन में, देवी-देवताओं के अनुष्ठान करने में, भूत-प्रेत के झंझटों से मुक्ति पाने में और कुरीतियों के जाल में फंसे रहने के कारण दयनीय हो गई है। अत: ऐसे दलित समाज पर विचार करना होगा जो वास्तव में दलितों के दलित हैं?'

आरक्षण को लेकर सरकार, न्यायालय और समाज तीनों में चर्चा व चिंतन चल रहा है। सदियों से जो वर्ग पिछड़ा रहा है उसे विकास हेतु आरक्षण चाहिए लेकिन प्रश्न है कि एक ही परिवार कितनी पीढिय़ों विशेषतया जो सरकारी उच्च पदों का लाभ ले रहा है या आर्थिक रूप से समृद्ध है, उसे आरक्षण लाभ कितने समय तक मिलना चाहिए। उसी समाज के उस वर्ग को जो आजादी के बाद भी आरक्षण का लाभ इसलिए नहीं ले पा रहा क्योंकि वह पिछड़ों में भी पिछड़ा है, आज भी दयनीय स्थिति में है वो क्या करे? जिस परिवार की तीन पीढिय़ां आरक्षण का लाभ उठा चुकी हैं, या जो आर्थिक रूप से सम्पन्न है और बंगला, गाड़ी और अन्य भौतिक सुख-सुविधाओं का लाभ ले रहे हैं तथा आयकरदाता है उस परिवार को 'क्रीमी लेयर' घोषित कर आरक्षण के लाभ से वंचित कर देना चाहिए तभी पिछड़े व दलित के उस वर्ग को आरक्षण का लाभ मिल सकेगा जो परिस्थितियों कारण पीछे रह गए हैं।

इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।

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