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श्री कृष्ण संदेश

Publish Date: September 03 2018 10:50:10am

भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को निमित बनाकर सारे विश्व को श्री गीता के रूप में जो महान उपदेश दिया है अगर भगवान द्वारा दिए संदेश को समझ कर इंसान कर्म करे तो उसको वह सुख वर्तमान में ही मिल जाए जिसकी प्राप्ति के लिए वह दिन-रात एक करता है। श्री कृष्ण अर्जुन को संबोधित हो कहते हैं, हे भरत श्रेष्ठ अब तीन प्रकार के सुख को भी तुम मुझसे सुनो। जिस सुख में साधक मनुष्य भजन, ध्यान और संवादि के अभ्यास से रमण करता है और जिससे दुखों के अंत को प्राप्त हो जाता है जो ऐसा सुख है वह आरंभकाल में यद्यपि विष के तुल्य प्रतीत होता है परन्तु परिणाम में अमृत के तुल्य है। इसीलिए वह परमात्मा विषयक बुद्धि के प्रसाद से उत्पन्न होने वाला सात्विक कहा गया है। जो सुख विषय और इंद्रियों के संयोग से होता है वह पहले भोगकाल में अमृत के तुल्य प्रतीत होने पर भी परिणाम में विष के तुल्य है। इसलिए वह सुख राजस कहा गया है जो सुख भोगकाल में तथा परिणाम में भी आत्मा को मोहित करने वाला है। वह निंदा, आलस्य से और प्रमाद से उत्पन्न सुख तामस कहा गया है।

भगवान श्रीकृष्ण तीनों प्रकार के सुखों के वर्णन द्वारा अर्जुन को राजस और तामस सुख के त्याग तथा सात्विक सुख के ग्रहण का उपदेश कर रहे हैं। सात्विक सुख श्रेष्ठ है, किन्तु वह सुगम एवं सुलभ नहीं है, कठिन अभ्यास से प्राप्त होता है। सांसारिक विषयभोग मनुष्य को तत्काल सुख देते हैं, किन्तु दैहिक सुख गहन एवं स्थायी नहीं होता। अभ्यास द्वारा सात्विक सुख का बार-बार परिचय होने पर विवेकी मनुष्य का विषय-सुख तुच्छ होने लगते हैं तथा वह सात्विक सुख में रमण करने लगता है।

सात्विक सुख प्राप्त होने पर सांसारिक दु:खों का अंत हो जाता है। विषयभोगरत मनुष्य के लिए यह संसार अंत में निराशाप्रद एवं दु:खरूप सिद्ध होता है, किन्तु सात्विक सुख में रमण करने वाले उत्तम पुरुष के लिए यह संसार एवं जीवन मंगलमय हो जाता है। विवेकी पुरुष को संसार का विषयभोग-प्रधानस्वरूप दु:खमय तथा उसका प्रभुमयस्वरूप मंगलमय प्रतीत होता है। संसार को बुरा कहते रहने से और लोगों को कोसते रहने से अपना ही जीवन दूषित एवं दु:खमय हो जाता है। ज्ञान, भक्ति, सेवा, परोपकार आदि के अभ्यास द्वारा जीवन मंगलमय हो जाता है तथा मनुष्य सात्विक सुख में रमण करने लगता है। सात्विक सुख से भौतिक दु:खों की निवृत्ति हो जाती है अर्थात वह समस्त दु:खों से ऊपर उठ जाता है।

सात्विक सुख (मन की निर्मलता का सुख) का अभ्यास दुष्कर होता है। ध्यान, वैराग्य, विवेकपूर्ण विचार, अनुशासन, संयम एवं मनोनिग्रह की साधना कठिन है तथा विषय-सुख के प्रलोभन पर विजय प्राप्त करना और चेतना को ऊंचे स्तर तक उठाना भी कठिन होता है। निश्चय ही सात्विक सुख यत्नसाध्य है। साधारण मनुष्य को सांसारिक सुख-भोग अमृतमय तथा आध्यात्मिक साधना विषमय प्रतीत होती है। किन्तु कठिन होने के कारण जो पहले विष प्रतीत होता है, वही अंत में अमृत अर्थात कल्याणकारी सिद्ध होता है। छात्रों को चित्रपट आदि के प्रलोभन से मुक्त होना तथा आलस्य और प्रमाद (लापरवाही) छोड़कर पुस्तकाध्ययन करना विषमय अर्थात क्लेशप्रद प्रतीत होता है, किन्तु अंत में वही उनके लिए जीवन की सफलता एवं उल्लास का कारण हो जाता है। दृढ़ संकल्प एवं निरन्तर अभ्यास द्वारा साधना-काल की कठिनाई को पार करके विजय पाने वाला मुनष्य ही जीवन में सफलता प्राप्त करता है।

जब मनुष्य की बुद्धि सत्वगुण में स्थित हो जाती है तथा राग-द्वेष से विमुक्त होकर निर्मल एवं प्रशांत हो जाती है अर्थात सांसारिक आसक्ति, कामना, लोभ, क्रोध, मोह, मद, चिंता भय आदि से विमुक्त हो जाती है, उसमें सात्विक प्रकाश एवं प्रसाद (स्वच्छता एवं सहज प्रसन्नता) का उदय हो जाता है। सात्विक सुख उत्तम सुख है तथा इसमें दु:ख की आत्यन्तिक निवृत्ति (सदैव के लिए निवृत्ति) हो जाती है। मूढजन सांसारिक संताप से दु:खी होकर मानसिक शांति के लिए तामस और राजस सुख की ओर दौड़ते हैं, किन्तु उससे उनका संताप उग्र एवं तीक्ष्ण ही होता है। वास्तव में राग-द्वेष से मुक्त होने एवं निर्विकार होने पर चित्त प्रशांत होता है तथा क्षणिक राजस और तामस सुखों के पीछे दौडऩे वाला मनुष्य कभी स्थायी सुख प्राप्त नहीं करता।

अंतिम निर्णय तो इंसान ने ही लेना है भगवान ने तो राह दिखाई है चलना तो इंसान को ही है।

इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।

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