नई दिल्ली (उत्तम हिन्दू न्यूज): भारतीय लेखिका गीतांजलि श्री और अमेरिकी अनुवादक डेजी रॉकवेल ने गुरुवार को उपन्यास टॉम्ब ऑफ सैंड के लिए अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार जीता है। गीतांजलि श्री की यह किताब मूल रूप से हिंदी में रेत समाधि के नाम से प्रकाशित हुई थी जिसका अंग्रेजी अनुवाद, टॉम्ब ऑफ सैंड, डेजी रॉकवेल ने किया है। 50,000 पाउंड के साहित्यिक पुरस्कार के लिए पांच अन्य किताबों भी प्रतिस्पर्धा में थीं। पुरस्कार की राशि लेखिका और अनुवादक के बीच बांटी जाएगी।
मूल रूप से हिंदी भाषा में लिखी गई यह ऐसी पहली किताब है, जिसने इतना बड़ा खिताब जीता है। जहां गीतांजलि श्री दिल्ली से हैं, तो वहीं डेजी रॉकवेल वर्मोंट की रहने वाली हैं। जजों के पैनल में शामिल अनुवादक फ्रैंक वेनी ने कहा कि जजों ने खूब विचार विमर्श करने के लिए ‘टॉम्ब ऑफ सैंड’ का चयन किया है। ये किताब एक बुजुर्ग विधवा महिला की कहानी बताता है, जिसने भारत और पाकिस्तान के विभाजन के वक्त 1947 के अपने अनुभवों को साझा किया है। वेनी ने कहा है कि डरावने अनुभवों को बयां किए जाने के बावजूद ये काफी रोचक किताब है।
उन्होंने कहा, ‘इसमें बेहद गंभीर मुद्दों के साथ ही शोक, नुकसान और मौत की दास्तां बयां की गई है। ये किताब असाधारण रूप से बेहद मजेदार है।’ श्री की किताब ने पांच अन्य किताबों को शिकस्त देकर खिताब अपने नाम किया है। इनमें बोरा चुंग की लिखी कर्स्ड बनी शामिल है जिसे कोरियाई से एंटोन हूर ने अनुवाद किया है। इसके अलावा जॉन फॉसे द्वारा ए न्यू नेम: सेप्टोलॉजी VI-VII भी इस दौड़ में थी, जिसे नार्वेई भाषा से डेमियन सियर्स द्वारा अनुवाद किया गया है।
इस खिताब की बात करें, तो अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार ब्रिटेन और आयरलैंड में प्रकाशित अनुवादित फिक्शन कहानियों के लिए हर साल दिया जाता है। इसके पीछे का उद्देश्य फिक्शन से जुड़े कंटेंट को आगे बढ़ाना है। वेनी ने कहा कि अनुवाद किया गया साहित्य किसी कॉड लीवर ऑयल की तरह नहीं है, जो कि अच्छा माना जाता है। वहीं टॉम्ब ऑफ सैंड की बात करें, तो इसे ब्रिटेन में प्रकाशक एक्सिस प्रेस ने प्रकाशित किया है। इसके संस्थापक अनुवादक डेबोराह स्मिथ है जिन्होंने हांस कांग के ‘द वेजिटेरियन’ का अनुवाद करने के लिए 2016 में अंतर्राष्ट्रीय बुकर पुरस्कार जीता है। हालांकि उपन्यास अभी अमेरिका में प्रकाशित नहीं हुआ है।
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